फेफड़ों की टीबी के इलाज के बाद भी मरीजों में फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित: डा तारिक महमूद

पोस्ट ट्यूबरकुलोसिस लंग डिजीज पर किया गया महत्वपूर्ण शोध

अमेरिकन थोरैसिक सोसाइटी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में होगा प्रस्तुत

प्रयागराज। मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग तथा आईएमएस बीएचयू, वाराणसी के टीबी एवं रेस्पिरेटरी डिजीज विभाग द्वारा संयुक्त रूप से किए गए महत्वपूर्ण शोध अध्ययन में पाया गया है कि फेफड़ों की टीबी के सफल उपचार के बाद भी अनेक मरीजों में फेफड़ों की कार्यक्षमता लंबे समय तक प्रभावित रह रही है। यह अध्ययन छह सौ पोस्ट ट्यूबरकुलोसिस लंग डिजीज मरीजों पर किया गया। अध्ययन का उद्देश्य टीबी के बाद फेफड़ों की कार्यक्षमता का मूल्यांकन करना तथा ग्रामीण एवं शहरी मरीजों के साथ साथ धूम्रपान करने वाले और न करने वाले मरीजों की तुलना करना था। एमडी, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष श्वसन रोग विभाग एस आर एन अस्पताल डा तारिक महमूद ने बताया कि शोध को प्रतिष्ठित अमेरिकन थोरेसिक सोसाइटी (एटीएस) अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 2026
में प्रस्तुति हेतु स्वीकार किया गया है। अध्ययन का सार 19 मई को अमेरिकन जर्नल ऑफ रेस्पिरेटरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष में पाया गया है कि टीबी के उपचार के बाद भी बड़ी संख्या में मरीजों में स्थायी श्वसन संबंधी विकार बने रहते हैं।
छह सौ मरीजों में
ऑब्सट्रक्टिव वेंटिलेटरी डिफेक्ट 312 मरीजों (52 फीसद) में पाया गया।रिस्ट्रिक्टिव वेंटिलेटरी डिफेक्ट 192 मरीजों (32 फीसद) में पाया गया।
मिक्स्ड वेंटिलेटरी डिफेक्ट ऑब्सट्रक्टिव और रिस्ट्रिक्टिव 96 मरीजों (16 फीसद) में पाया गया। प्रोफेसर डा तारिक महमूद ने बताया कि अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि फुफ्फुसीय टीबी फेफड़ों के ऊतकों एवं उनकी कार्यक्षमता को गंभीर और स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है। अध्ययन के महत्वपूर्ण निष्कर्ष एवं सुझाव शोधकर्ताओं ने कहा कि फेफड़ों की टीबी की शीघ्र पहचान और समय पर उपचार अत्यंत आवश्यक है, जिससे फेफड़ों को होने वाली स्थायी क्षति को कम किया जा सके। धूम्रपान को पूरी तरह बंद करना आवश्यक है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में बायोमास ईंधन लकड़ी, उपले, धुआँ आदि के संपर्क से बचाव करना चाहिए। टीबी उपचार पूर्ण होने के बाद मरीजों की
फुफ्फुसीय कार्य परीक्षण (पीएफटी) कराई जानी चाहिए, ताकि फेफड़ों की वास्तविक कार्यक्षमता का आकलन किया जा सके। डा तारिक महमूद ने बताया कि
यदि मरीज को लगातार खांसी या सांस फूलने जैसी शिकायत हो, तो तुरंत चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। शोधकर्ताओं ने कहा कि पोस्ट ट्यूबरकुलोसिस लंग डिजीज के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है, क्योंकि टीबी से ठीक होने के बाद भी अनेक मरीज लंबे समय तक श्वसन संबंधी समस्याओं से पीड़ित रहते हैं। यह अध्ययन भारत में पोस्ट टीबी श्वसन रोगों के बढ़ते बोझ को समझने तथा टीबी मरीजों के दीर्घकालिक फॉलो अप की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

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